Monday, 1 August 2011

Hold one finger, help them write their future...

http://epaper.patrika.com/9003/Rajasthan-Patrika-Jaipur/01-08-2011#p=page:n=9:z=1
वर्ष 2002 में संविधान में 86वां संशोधन कर अनुच्छेद 21 अ जोड़ा गया और शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार बन गया। कानून लागू हुआ पिछले साल और अभी तक सरकार उन बच्चों की पहचान तक नहीं कर पाई है जिन्हें ये हक मिलना है। प्रारम्भिक शिक्षा की प्राथमिकता ही तय नहीं। न हक की गारण्टी, न सुविधाओं की, न गुणवत्ता की।
हर एक थामे नन्ही उंगली
मुफ्त व अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा कानून लागू होने के बाद भी न इसके क्रियान्वयन को लेकर सरकार के पास न कोई कार्ययोजना है न संजीदगी। राजस्थान पत्रिका ने राजस्थान, मध्यप्र्रदेश और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में चलाए आओ पढ़ाएं, सबको बढ़ाएं अभियान के तहत गरीब बच्चों को नज़दीकी निजी स्कूलों की 25 फीसदी सीटों पर मुफ्त प्रवेश की मुहिम शुरू की। प्रदेश में इस प्रावधान को लेकर न तो निजी स्कूलों के पास कोई निर्देश पहुंचे, न ही फीस भुनर्भरण का कोई फार्मूला अभी तक तैयार हुआ। जागरूकता के अभाव में असल वंचित बच्चों ने प्रवेश के लिए आवेदन ही नहीं किया तो स्कूलों की मिली भगत से सक्षम परिवारों ने ये आरक्षित सीटें हथिया लीं। राजस्थान सरकार ने तो 20 हजार मासिक आय वाले परिवारों को गरीब और वंचित की परिभाषा में शामिल कर असल हकदारों को फिर हाशिए पर धकेल दिया है।

हमारी पहल पर हजारों बच्चों को निजी स्कूलों ने प्रवेश मिल गया, जिनका पूरा लेखा जोखा हमारे पास है और भामाशाहों ने उनकी किताबों, बस्तों, यूनीफॉर्म आदि की जिम्मेदारी भी उठा ली लेकिन अब बड़ी चुनौती ये है कि ये गरीब बच्चे आलीशान स्कूलों के माहौल और पढ़ाई से सामंजस्य कैसे बिठाएं और आए दिन होने वाले खर्चों का बोझ कैसे सहें। कई स्कूल इन बच्चों को हर संभव मदद कर रहे हैं तो कुछ ऐसी परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं कि अभिभावक तंग आकर खुद ही दाखिला निरस्त करवा लें। राजधानी के निजी स्कूल इन सीटों पर प्रवेश की कोई जानकारी नहीं दे रहे जबकि कानून साफ कहता है कि आरक्षित सीटों की प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी आम जन के लिए उपलब्ध रहेगी और सीटों की स्थिति उन्हें सार्वजनिक करनी होगी। पूछने पर सभी कह रहे हैं कि हमने 25 फीसदी गरीबों को दाखिला दिया है। राजस्थान सरकार 25 फीसदी आरक्षित सीटों पर की गई भर्ती की रिपोर्ट भी इकट्ठा कर रही है, अब नज़र ये रखनी है कि कागज़ों में किन किनको गरीब बताकर कानून का मखौल उड़ाया जाता है। अभियान के तहत हमने सरकार की चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे और नामांकन अभियान की भी पोल खोली और सरकारी स्कूलों में भी अभियान के जरिए बच्चों को दाखिले करवाए। मीडिया एक्शन ग्रुप के बैनल तले चले इस अभियान में समाज के लिए प्रतिबद्ध लोगों, नागरिक समूहों, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, अध्यापकों आदि को भी जोड़ा, गरीब बस्तियों में जाकर समझाइश की और निजी स्कूलों से निवेदन। दूर दराज के गांवों में जाकर अधिकार के बारे में जागरूक किया और नामांकन करवाया। सरकारी स्कूलों में भी दाखिले करवाए। मालूम हुआ सरकार के हिसाब से जितने बच्चे स्कूल से बाहर हैं उससे ज्यादा हमने उस गांव में प्रवेश करवा दिए। हाशिए के लोगों को जोडऩे के लिए रात्रि चौपाल, चलो स्कूल और शिक्षा पंचायत  जैसे कई प्रयोग किए। अभियान के तहत उजागर खामियों, गरीब बच्चों को मिली मदद और नवाचारों की सारी जानकारी इस ब्लॉग पर पढ़ी जा सकती है।

हर नागरिक एक बच्चे की जिम्मेदारी उठा ले तो हालात जल्द बदलेंगे। उन्हें अच्छी शिक्षा का हक दिलाने के लिए चाहे निजी स्कूल में या सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाएं और हमें सूचित भी करें, ताकि जन पहल का आंकड़ा भी हमारे पास रहे।

 केन्द्र का पक्ष- निजी स्कूलों में 25  फीसदी सीट वंचित वर्ग के लिए आरक्षित रखने के मसले पर पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में अटार्नी जनरल जीई वहनवती ने निजी स्कूलों की आपत्ति खारिज की। तीन जजों की बेन्च के सामने उन्होंने कहा स्कूल चलाने के अधिकार से कहीं ज्यादा अहमियत बच्चों के अधिकार की है। अलग अलग सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक पृष्ठभूमि के बच्चों का एक ही कक्षा में साथ बैठकर संवाद करना उनके सीखने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।


क्षिप्रा  माथुर 
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