Friday, 29 July 2011

Bhilwara - 402 children enrolled in school in RTE campaign


 न खुले द्वार, न पड़ा पार

- एक भी स्कूल नहीं बढ़ा आगे
- विभाग फिसड्डी, अधिकारी नाकाम
 भीलवाड़ा. उनके मन में पैदा हुई ललक चंद लम्हों बाद ही हवा हो गई। वे मानते थे कि इस बार उनकी मुराद पूरी होगी और वे अच्छे स्कूल में पढ़ अपना जीवन सुधार सकेंगे। लेकिन यह हो न सका। शहर से लेकर जिले भर के हाल कुछ ऐसे ही है। भीलवाड़ा के किसी भी निजी स्कूल ने गरीब बच्चों को नि:शुल्क प्रवेश नहीं दिए, वही कई विद्यालयों ने प्रारंभिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों को धोखे में रखा।
हम भी नहीं कम
विद्यालय डाल-डाल तो अधिकारी भी पात-पात। विभागीय अधिकारियों के पास न तो किसी स्कूल के नि:शुल्क प्रवेश दिए गए बच्चों के आंकड़े है और न ही विद्यालयों ने इसमें रूची दिखाई हैं।
तो हम क्या करें
अधिकांश निजी और नामी स्कूलों के आगे अभिभावक खासे नाकाम रहे है। यह नाकामी किसी ओर बात की नहीं सिर्फ प्रवेश की हैं, हाल ऐसे अजीब है कि यदि किसी अभिभावक की ओर से शिक्षा के अधिकार कानून का किसी निजी स्कूल संचालकों को हवाला भी दिया जाता है तो वह कहते है हम क्या करें, सरकार से जाकर ही कहो।
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    पत्रिका ने दी शिक्षा की दीक्षा  
- अंधेरी बस्तियों में जगाई शिक्षा की अलख
- मिला पांच लाख का स्टे हॉम प्रोजेक्ट
- 402 बच्चों को मिला प्रवेश
- गरीबी रेखा से नीचे आने वाले एक हजार बच्चों को पहुंचाया
समुचित शिक्षा की ओर।
-सफर बन गया कारवां

भीलवाड़ा. जिले में जून माह में मीडिया एक्शन ग्रुप के माध्यम से सबको पढ़ाएं सबको बढ़ाएं अभियान की शुरुआत की गई थी। अभियान की शुरुआत एक ऐसी बस्ती से हुई जहां 125 से अधिक बच्चे शिक्षा से दूर थे। शहर के बीच बनी इस बंजारा बस्ती के हाल खराब थे। यहां बच्चे सुबह से शाम तक गलियों में थैलियों से लेकर कबाड़ सामग्री तलाशते और उन्हें बेच शाम को कुछ पैसों के साथ खुश होकर घर लौट जाते। इन बच्चों के जीवन में शिक्षा और स्कूल नाम की कोई चीज नहीं थी। वे सिर्फ अपने में मगन, परिजनों में रमें और अपनी मस्ती में थे। सरकारी सूचनाओं से परे इस बस्ती में सैकड़ों भटकते बच्चे गुमनामी में जीवन जीने को मजबूर थे। कहानी यहां खत्म नहीं होती। मीडिया एक्शन ग्रूप इस बस्ती के लोगों के बीच पहुंचता है और पहला साथ उसे मिलता है, प्रौढ़ शिक्षा संघ का। संघ के अध्यक्ष भंवरसिंह चौधरी ग्रुप के साथ मिल यहां के कायाकल्प में जुटते हैं। ग्रुप के साथ ही संवाददाता एनजीओ सम्बोधि महिला मण्डल को भी अपने साथ जोड़ता है। मण्डल की ओर से मंजू पोखरना और अर्चना सोनी का यह संगठन इस बच्चों को कपड़े और अन्य शिक्षण सामग्री मुहैया करवाने की कवायदों में लग जाता है। एक और जहां संगठनात्मक स्तर पर बच्चों की जरूरतें पूरी करने की तैयारी होती है तो दूसरी ओर ग्रुप इस अभियान में सर्व शिक्षा अभियान को भी जोड़ता है। अभियान के जिला परियोजना समन्वयक बीएल डीडवानिया, अतिरिक्त परियोजना समन्वयक अनिल बांगड़, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी प्रहलाद पारीक, सहायक समन्वयक केएल जीनगर और कार्यक्रम सहायक सत्यनारायण शर्मा ग्रुप के साथ मिलकर राजस्थान प्रारंभिक शिक्षा परिषद जयपुर से स्टे हॉम प्रोजेक्ट की स्वीकृति लेते है। काफी अड़चनों के बाद मिली इस स्वीकृति की फाइल प्रशासनिक स्तर पर अटकती नजर आती है, लेकिन यहां भी ग्रुप अपने पूरे दम खम के साथ इस फाइल को गति दिलवाता हैं। जिला परिषद में तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी और जिला प्रमुख का अनुमोदन करवा यहां सम्पूर्ण रूप से स्टे हॉम संचालन की शुरुआत होती है। बंजारा बस्ती के मुखिया माने जाने वाले लक्ष्मण बंजारा सहित किशन बंजारा और अन्य बंजारा लोगों की मदद से बच्चों को पढ़ाई के लिए तैयार किया जाता है। बच्चों के लिए पूरी सुविधा के साथ शिक्षण की व्यवस्था की जाती है। अब पत्रिका का मीडिया एक्शन ग्रुप इन बच्चों के लिए आंगन में स्कूल ले आया था। उन्हें घर से चार कदम दूर ऐसी शिक्षा मुहैया होनी थी, जिन पर सरकार पांच लाख रुपए खर्च कर रही हैं। बच्चों के लिए कक्ष और इसमें लगे पंखे, रहने और आराम के लिए गद्दे और सम्पूर्ण शिक्षण सामग्री मुहैया हो जाती है। अब उनके कायाकल्प का बीजारोपण हो चुका है। यहां नियमित दस माह तक कक्षाएं चलेंगी, बच्चे अपनी इच्छा से रात को भी उस स्टे हॉम में रहकर पढ़ाई कर सकेंगे। अधिकारियों की माने तो यदि सारी स्थितियां ठीक रही तो यहां एक स्कूल भी खोला जा सकता है, खैर भविष्य के गर्भ में क्या है, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इन बच्चों का वर्तमान सुधरना शुरू हो चुका है। अब तक यहां के करीब 140 बच्चों को स्कूल से जोड़ा गया है, इनमें से 50 बच्चे स्टे हॉम में तो अन्य 90 बच्चे समीपस्थ स्कूलों में पढ़ेंगे।
यहां फिर गढ़ दी पौथी की कहानी
मीडिया एक्शन ग्रुप ने रोटरी क्लब के तत्कालीन अध्यक्ष सीपी अग्रवाल के साथ मिलकर पटेल नगर स्थित कच्ची बस्ती का दौरा किया और करीब 40 बच्चे खोजे। इन बच्चों को भी बाद में समीपस्थ स्कूलों में प्रवेश करवाया गया। इसके लिए सर्व शिक्षा अभियान ने वैकल्पिक कक्षाओं की शुरुआत के लिए प्रोजेक्ट तैयार कर प्रारंभिक शिक्षा परिषद भेजा है।
हलेड़ गांव में घर-घर पहुंचे पत्रिका के मीडिया एक्शन ग्रुप ने करीब २२ ऐसे बच्चे ढूंढे जो शिक्षा की देहरी से दूर थे। यहां ग्रुप ने उपभोक्ता अधिकार समिति के इकाई अध्यक्ष कैलाश सुवालका के साथ मिलकर घर-घर पहुंच शिक्षा का मार्ग खोला। अब यह सभी बच्चे कोई निजी तो कोई सरकारी स्कूल में प्रवेश पा चुका हैं।
ऐसे बढ़े कदम शिक्षा की ओर...   
 पत्रिका के मीडिया एक्शन ग्रुप ने वेदान्ता फाउण्डेशन के साथ मिलकर गांव-गांव, ढाणी-ढाणी शिक्षा की अलख जगाने के लिए रैलियां निकाली। इन रैलियों के माध्यम से ग्रुप ने विभिन्न गांवों में २०० से अधिक बच्चों को शिक्षा से जोड़ा है। यह ऐसे बच्चे है, जो या तो विद्यालय से ड्रॅाप आउट है या स्कूल की दहलीज तक ही नहीं पहुंचे।
यहां फिर हुआ कमाल
 ग्रुप की छोटी सी पहल ने फिर कमाल कर दिया। ग्रुप ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के साथ मिलकर जिले के 34 छात्रावासों में गरीबी रेखा से नीचे वाले परिवारों के बच्चों को प्रवेश दिलवाने का अभियान शुरू किया था। इसमें ग्रुप की ओर से पत्रिका संवाददाता और विभाग ने १००० से अधिक बच्चों को प्रवेश दिलवाया है। अभी भी यह प्रयास निरंतर जारी है।



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